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समाज की प्रमुख विशेषताएं

समाज की प्रमुख विशेषताएं 








समाज की प्रमुख विशेषताएं निम्न भागों में विभाजित है - 

(1) समाज अमूर्त है - समाज व्यक्तियों को संग्रह नहीं है यह तो इन व्यक्तियों के बीच संबंधों की एक व्यवस्था है रयूटर ने लिखा है कि समाज व्यक्तियों का संग्रह नहीं है यह तो उन व्यक्तियों के बीच स्थापित संबंधों की एक व्यवस्था है संबंधों की स्थापना जागरूकता के द्वारा होती है जागरूकता का संबंध मस्तिष्क की चेतना से है मस्तिष्क की चेतना का कोई आकार प्रकार नहीं होता है इसे देखा और छुआ नहीं जा सकता है जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता वह मूर्त नहीं है इसीलिए समाज अमूर्त है 
(2) समाज व्यक्तियों का समूह नहीं है - समाज सामाजिक संबंधों की व्यवस्था है समाज भौतिक प्राणियों  का  समूह नहीं है यह तो इन भौतिक प्राणियों के बीच जो संबंध पाए जाते हैं उनकी एक व्यवस्था है इसलिए समाज व्यक्तियों का समूह नहीं है 
(3) समाज मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है - समाज केवल मानव प्राणियों में ही नहीं पाया जाता है बल्कि समाज पशुओं में भी पाया जाता है चीटियों और मधुमक्खियों में भी प्रशंसा सामाजिक संगठन पाए जाते हैं जीवन का स्तर जितना ही निम्न होता है जागरूकता की मात्रा भी उतनी ही कम होती है जागरूकता सामाजिक संबंधों का आधार है जागरूकता सिर्फ मनुष्यों में ही पाई जाती है इसलिए समाजशास्त्री अर्थों में समाज का अर्थ सिर्फ मनुष्य समाज से ही है पशुओं में जागरूकता पाई भी जाती है तो वह निम्न मात्रा में रहती है 
(4) समाज में समानता और असमानता - 
समानता - समानता समाज का बौद्धिक तत्व है समानता और समानता की भावना के अभाव में साथ होने की भावना की  पारस्परिक मान्यता नहीं हो सकती है ऐसी अवस्था में समाज का अस्तित्व संभव नहीं है दोनों प्रकार की समानता आवश्यक है शारीरिक और मानसिक मनुष्य की शारीरिक बनावट समान है अतः उनकी आवश्यकताएं भी समान है अपनी आदतों की समानता के लिए वे एक दूसरे से मिलते जुलते हैं और सहयोग स्थापित करते हैं इसके परिणाम स्वरूप सामाजिक संबंधों को जन्म होता है सामाजिक संबंधों के कारण उनमें एक होने की चेतना का विकास होता है इसी चेतना लोग गिडिंग्स लिंग जाति के प्रति चेतना कह कर संबोधित किया है प्राचीन काल में लोग अपने रक्त संबंधियों को ही समाज में नाम से संबोधित करते थे भारतीय वसुधैव कुटुंबकम की धारणा ऐसे चेतना के द्वारा सफल हो सकती है 
असमानता - जिस प्रकार समाज में समानता आवश्यक है उसी प्रकार असमानता भी आवश्यक है असमानता के अभाव में समा की कल्पना ही नहीं की जा सकती यदि सभी व्यक्ति समान होते तो उनके संबंध चीटियों और मधुमक्खियों के समान ही सीमित होते उनके पास पारीक आदान-प्रदान ना हो पाता और सहयोग की भावना का विकास भी ना हो पाता उदाहरण के लिए यदि समाज में सिर्फ पुरुष ही पुरुष होते तो संसृति उत्पादन की प्रक्रिया अवरोध हो जाती और मानव अगली पीढ़ी को जन्म दे पाता स्त्री और पुरुष की शारीरिक रचना एक दूसरे से भिन्न है यह भी नेता एक दूसरे के पूरक है यह सामान था जो यौन संबंधों में पाई जाती है या सामाजिक व्यवस्थाओं पर भी लागू होती है यह आसमान तक कई प्रकार की होती है -जैविक प्राकृतिक और सामाजिक समाज का इन्हीं भिन्नताओं द्वारा होता है जैसे - लिंग संबंधी असमानता , शारीरिक असमानत , मानसिक असमानता संवेगों में  असमानता , चरित्र की असमानता , हितों और रुचियां की असमानता आदि 
(5) समानता मुख्य है - समाज में समानता और असामान्य दोनों पाई जाती है किंतु इनमें समानता का महत्व अधिक है श्रम विभाजन इसका अच्छा उदाहरण है इसमें पहले तो सहयोग और बाद में विभाजन है यदि श्रम विभाजन को बाह्न रूप से देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह असमानता पर आधारित है क्योंकि सभी व्यक्ति भिन - भिन कार्यों यदि संपादन करते हैं यदि इसे आंतरिक रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है कि श्रम विभाजन समानता के सिद्धांतों पर आधारित है क्योंकि सभी व्यक्ति समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए असमान कार्य करते हैं परिवार का निर्माण घर बसाने और इसमें है कि सामान्य अभिलाषा की दृष्टि से हुआ होगा और इस अभिलाषा के पूर्ति के लिए परिवार के सदस्य भिन भिन कार्य करते हैं समाज के लिए आधारभूत तत्व समानता है और इसके प्राप्ति के लिए असमान तरीकों को अपनाया जाता है 

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